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Saturday, June 28, 2014

वीकेंड

हफ़्ते भर की थकान दूर करने
आने वाले हफ़्ते का मेकओवर करने
लो आ गया तुम्हारा वीकेंड ।

जागो,
आज तो नींद जल्दी खुलेगी तुम्हारी
वीकेंड के कीमती पलों को
यूँ ही कैसे गुज़ार दोगे !

जागो कि हफ़्ते भर से रखे
एडिटोरियल पेज तुम्हारे इंतज़ार में हैं ।
जागो कि फ़ोन में सेव किये
रिमाइंडर्स बस बजने ही वाले हैं ।

जागो कि दरवाज़े के पीछे हफ़्ते भर से
टंगे कपड़े धुलने के इंतज़ार में
तुम्हारा बासी चेहरा देख रहे है।
जागो कि इस हफ़्ते रिलीज़ हुई
मूवी भी तुम्हें सिनेमा हॉल में देखना चाहती है ।

ये वीकेंड तुम्हारे वीकडेज़ से
भी ज़्यादा व्यस्त है ।
और तुम कहते हो, छुट्टी का दिन है
आज सब कुछ मस्त है !

हफ़्ते भर तड़पकर कहते हो
काम से एक मिनट की फ़ुर्सत नहीं ।
तुम्हीं बताओ,
वीकेंड पर भी तुम्हारे पास
ख़ुद के लिए वक़्त नहीं !

Friday, June 27, 2014

स्टेशनरी शॉप...

नुक्कड़ की स्टेशनरी शॉप वाले अंकल,

सुना है आपकी दुकान अब बंद होने वाली है। आपकी दुकान से जुड़ी मेरी बहुत-सी यादें हैं, जिनके बारे में मैं अबतक सोचती हूँ । आप सोचेंगे आपकी दुकान से मेरी ऐसी कौन सी यादें जुड़ी है.. तो मैं कहूँगी, जुड़ी हैं, बहुत सारी यादें जुड़ी हैं । ज़रूरी नहीं होता कि किसी की याद हमें तभी आये, जब सामने वाला भी हमें याद करता हो । मैं जब कभी किसी भी स्टेशनरी शॉप के बगल से गुज़रती हूँ, मुझे अपनी वो तमाम बातें याद आती हैं.. जो मैंने आपकी दुकान के काउंटर पर खड़े हुए संजोयी थी । वहीँ, जहां मैंने कई बार अपनी इच्छाओं को इरेज़र से मिटाया था ।

मैं आपकी दुकान पर जाती और अपने सारे पसंदीदा सामानों के दाम पूछकर वापस आ जाती.. इस काम को मैं हर बार करती जब भी आपकी दुकान में कुछ नया टंगा नज़र आता । वो कई नोंक वाली पेंसिल आती थी ना.. जिसमें से एक की नोंक खतम हो जाए तो पीछे से दूसरा निकाल कर डाल दो, और बाहर से अंदर का सबकुछ दिखता था । वो पेंसिल मुझे बहुत पसंद थी । मेरी क्लास में एक लड़की के पास वैसी ही पेंसिल थी, सभी रंगों की.. वो हर रोज़ सबको दिखाती । पर मेरी पेंसिल बॉक्स से वैसी पेंसिल नदारद थी ।

मैंने आपकी दुकान पर उस पेंसिल के कई रंग पसंद कर रखे थे । पीला और गुलाबी मुझे सबसे ज़्यादा अच्छा लगता था । लेकिन गुज़रते हुए जब आपकी दुकान में देखती तो हर रोज़ मेरी पसंद की एक पेंसिल वहाँ से गायब हो जाती । शायद मुझसे ज़्यादा वो पेंसिल किसी और को पसंद थे.. उसकी पसंद पूरी हो जाती.. मेरी पसंद विंडो शॉपिंग बन जाती ।

एक और था, कई रंगों वाले पेंसिल का पैकेट । स्केच पेन से थोड़ा महंगा आता था.. वो भी पसंद था मुझे । कॉपी के सादे पन्नों पर कई चित्र बनाए थे, सोचा था वो पेंसिल जब मेरे पास आएगी तब उनमें रंग भरुंगी ।

पर वो सारे चित्र अब भी अधूरे है.. कुछ तो खराब हो गए.. कुछ फेंक दिए, आपकी स्टेशनरी की दुकान पर देखे ख्वाबों की तरह ।

पर अब जब भी किसी को ऐसी चीज़ पसंद करते हुए देखती हूँ, तुरंत खरीद कर देती हूँ । दीदी के बच्चों को कई बार लाकर दिया, ड्राइंग बुक के साथ वो रंग-बिरंगी पेंसिल । जब वो मुस्कुराकर उसे इस्तेमाल करते हैं, मेरे सपने हंसने लगते हैं । मैं ख़ुद को वहीं, आपकी काउंटर पर खड़ी पाती हूँ.. खिलखिलाकर हँसती हुई.. सारे सामान अपने हाथों में लिए ।

आपकी दुकान ने मेरे सपनों को भले ही पूरा न किया हो, लेकिन किसी और के सपनों को अधूरा ना रहने देने की ताक़त दी है । सच बताऊँ तो मुझे अब महंगे पेन अच्छे नहीं लगते.. ऐसा लगता है उनसे हैंडराइटिंग ही नहीं बन रही । आप अपनी दुकान बंद मत होने दीजिये.. क्या पता अब भी मेरी तरह कोई रोज़ आपकी दुकान के चक्कर लगाती हो। प्लीज़, उसके ख़्वाबों का शटर मत गिराइए ।  उसके सपने तो बंद नहीं होने चाहिए न !

आपकी ग्राहक,
जिसने आपकी दुकान से शायद ही कभी कुछ ख़रीदा हो ।

Saturday, June 21, 2014

ऐसी तैसी डेमोक्रेसी

पिछ्ले एक हफ़्ते से इस पर लिखना चाह रही थी, पर लिख आज रही हूँ । हैबिटैट में ऐसी तैसी डेमोक्रेसी नाम से एक स्टैंड-अप कॉमेडी शो हो रहा था । मुझे ये शो हर हाल में देखना था, इतनी शिद्दत से मैंने यह शो देखने की चाहत की थी कि मुझे इसकी टिकट इस शो के मिस्टर परफ़ॉर्मर की दया-दृष्टि से मिल गयी । जी, इस मामले में तो मेरी किस्मत बहुत अच्छी निकली ।


बहरहाल, यह एक स्टैंड अप कॉमेडी शो था । इसके पहले इस तरह का शो कभी देखा नहीं था, तो मेरे लिए बहुत ख़ास रहा । सच कहूं, तो "स्टैंड अप कॉमेडी" की सही परिभाषा मुझे भी नहीं पता थी । पर यह शो देखने के बाद कुछ-कुछ तो समझ आ गया । ख़ास बात यह रही कि शो में पहला मज़ाक/सटायर/तंज इसी बात पर था कि स्टैंड अप शो होता क्या है ! वरुण ग्रोवर और संजय राजौरा ने ऑडिटोरियम में खचाखच भरी भीड़ को हंसाने का ज़िम्मा लिया था और इसमें उनका बखूबी साथ निभाया म्यूजिशियन राहुल राम ने । बीच-बीच में डेमोक्रेसी पर तंज करते गाये कुछ गीत बेहद मनोरंजक रहे । लाइव कॉमेडी शो की यही अच्छी बात होती है कि परफॉरमेंस देने वाले सीधे तौर पर ऑडियंस से कनेक्ट करते हैं । यहाँ भी वही हुआ, लेकिन वरुण ग्रोवर को दिल्ली की ऑडियंस के ह्यूमर पर शायद थोड़ा शक़ था.. इसलिए जब उनके एक पंच पर हम सब हँसे, तो मिस्टर परफ़ॉर्मर ने बड़ी ही अदा के साथ कहा कि, "I never thought delhi audience will understand it."  इस बात पर उन्हें डबल तालियाँ मिली । नब्बे मिनट तक पूरा ऑडिटोरियम हँसता रहा । हाँ, शो के दौरान कुछ तीखी गालियों का ज़रूर इस्तेमाल हुआ, जिन्हें मैं अगली बार से कम करने को कहूँगी ।


हँसते-हँसाते नब्बे मिनट का शो खत्म हुआ पर मुझे लग रहा था कि यह नब्बे मिनट थोड़ी देर और चलता । शो खत्म होने के बाद पूरी ऑडिटोरियम ने स्टैंडिंग ओवेशन दिया (पूरे दिल से)। इस पूरे दिल से में दिल्लीवालों को एक परसेंट इस बात की भी ख़ुशी थी कि यह शो मुंबई के बदले पहले दिल्ली में हुआ । इस मामले में दिल्ली १-० से आगे हो चुका है ।



हालांकि, मुझे इस शो की टिकट बहुत आराम से मिल गयी थी फिर भी मैं इसके अगले शो के लिए सबको टिकट खरीद कर इसे देखने की गुज़ारिश करुँगी । यकीन मानिए, मुझे इस शो के प्रमोशन करने के पैसे नहीं मिले है, लेकिन हाँ, ये ज़रूर कहूँगी कि जहां आप 250-300 ₹ की Sub खा सकते हैं और उससे चर्बी चढ़ा सकते हैं तो उस चर्बी को उतारने के लिए और उस Sub से भी ज़्यादा हेल्दी 'हंसने' के लिए तो इतने पैसे खर्च किये ही जा सकते है । यह बात मुझे ज़्यादा अच्छे से समझ आई जब मैंने अपनी रो में ही बैठे एक उम्रदराज़ को पूरे शो के दौरान ज़ोर-ज़ोर से हँसते सुना था । और मैं, जिसे वापस आते वक़्त मेट्रो-ऑटो में हर बात हल्की लग रही थी । फ़िक्र नॉट टाइप । और ये सब कुछ स्टेज के उन 'माय डिअर' परफारमर्स की वजह से ।






 

Friday, June 20, 2014

यात्रा संस्मरण

यह यात्रा संस्मरण मेरा नहीं । इसमें मेरे भैया की पहली विदेश यात्रा के दौरान पर्थ शहर में घटी एक घटना का ज़िक्र है । शब्द उसी के हैं, बस ब्लॉग मेरा है । बहुत दिनों पहले उससे ज़ोर-ज़बरदस्ती से इस घटना को डायरी में लिखवा तो लिया था पर ब्लॉग पर आज टाइप करके डाला । पब्लिश करने जा रही थी तो ध्यान आया कि आज ही की तारीख़ पर भैया ने उड़ान भरी थी । अब यह यात्रा संस्मरण आप सब से शेयर कर रही हूँ... 



उस दिन मैं पर्थमिंट (Perthmint) से बैज़ंडीन (Bassendean) स्टेशन तक ट्रेन में सफ़र कर रहा था । स्टेशन पर टिकट ख़रीदने के लिए मैं  क्यू में लग तो गया, लेकिन जब मेरी बारी आई तो पता चला कि वह एक इन्क्व्यारी काउंटर है और ट्रेन की टिकेट ऑटोमैटिक टिकट वेंडिंग मशीन (एटीवीएम) से मिलेंगे ।
माफ़ कीजियेगा, मैं बताना भूल गया। ये ऑस्ट्रेलिया के एक शहर पर्थ की घटना है । मेरी पहली विदेश यात्रा के दौरान की । हाँ, मुझे पता नहीं था कि भारत की तरह विदेश में बड़े नोट लेकर घूमना आम बात नहीं है । मेरे पर्स में पचास-पचास डॉलर के नोट थे, वो भी कई सारे । क्यूंकि मुझे लगा था कि अगर ज़रुरत पड़ जायेगी तो कहाँ-कहाँ एटीएम ढूंढता फिरूंगा !


ख़ैर, किसी तरह खुदरे पैसे जोड़ जाड़कर मैंने एटीवीएम से टिकट ली और ट्रेन के सफ़र पर निकल पड़ा । एक के बाद एक ख़ूबसूरत इलाकों से होती हुई ट्रेन बैज़ंडीन स्टेशन पहुंची । बिलकुल वीरान, सुनसान, खाली पड़े स्टेशन पर कोई भी नहीं था .. सिवाय एक स्टेशन मास्टर और एक पुलिस वाले के । जिसने दिल्ली मेट्रो के रणभूमि टाइप वाले मेट्रो स्टेशन देखे हो, उसके लिए ये सब बहुत ही सुकून देने वाला था..अचंभित करने वाला तो था ही । वहाँ से निकल कर मैंने एक बस ली और कैवरशम वाइल्डलाइफ पार्क (Caversham Wildlife Park) के लिए चल दिया। वीकेंड पर यही जगह देखूंगा, ऐसा प्लान मैंने बनाया था । सो वहाँ पर मैंने बहुत सारे कंगारू के साथ कई और जानवर देखे ।


आराम से पूरा पार्क घूमने के बाद, (वापसी की टिकट खरीदने के लिए मुझे खुल्ले पैसों की ज़रुरत पड़ेगी.. ये बात मैं भूल चुका था।) मुझे बैज़ंडीन स्टेशन वापस आने के लिए टिकट खरीदनी थी, पर मेरे पास छोटी अमाउंट का कोई नोट या सिक्का नहीं था । कम से कम पचास डॉलर का नोट ही जेब में था । मुझे पचास डॉलर का चेंज चाहिए था, पर स्टेशन पर सिर्फ एक पुलिसवाला था । जब मैंने हिम्मत करके उससे पचास रुपये के चेंज  देने की बात कही, तो पुलिसवाले ने मुझे यूँ देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बुरा कह दिया हो । थोड़ी ऊँची आवाज़ में उसने मुझसे कहा, "Oh lord! 50 dollars! That's a big one. You can do a lot with that money but can't get a change. Go, get yourself a coffee from the market opposite the road. This way you can get coins."


इस बीच, मेरी बात ट्रेन स्टेशन से बाहर निकलते एक सज्जन ने सुनी और मेरे पास आकर मुझे एक डॉलर दे दिया और कहा, "Keep it. You can ask someone else for help for the rest of the amount." मैं अवाक् देखता रह गया.. वो सज्जन आगे निकल गए । पर फिर मैंने सोचा एक डॉलर काफ़ी नहीं है, इसलिए मैं स्टेशन से वापस बाहर निकल कर मार्केट पहुंचा । जिस कॉफ़ी शॉप की बात उस पुलिसवाले ने कही थी, वो दस मिनट पहले बंद हो चुका था । एक वृद्ध जोड़े से पूछा तो पता चला कि शाम पांच बजे सारी दुकानें बंद हो जाती है, पर आगे की तरफ़ एक-दो दुकानें खुली होंगी । मैं आगे बढ़ा, पर एक भी दुकान खुली न मिली । आगे एक ट्रैफिक सिग्नल पर सड़क पार करते वक़्त बैसाखी लिए एक आदमी (शायद भिखारी) से मैंने अपनी परेशानी ज़ाहिर की । मैं अभी ये जानने की कोशिश कर ही रहा था कि आगे कोई दुकान वगैरह है या नहीं.. इतने में ही उसने मुझे 70 सेंट (cent) दे दिये  और कहते हुए निकल गया कि आगे किसी और से मांग लेना। मैं सत्तर सेंट हाथ में लिए खड़ा रहा.. मैं समझ नहीं पाया भिखारी मैं था या वो ।


ख़ैर, ये जंग मुझे जारी रखनी थी.. सो मैं आगे बढ़ा । वहाँ मुझे दो महिलाएं मिली । जैसे ही मैंने अपनी बात कहनी शुरू की, उनमें से एक ने कहा, "No,No! I don't have any money. Go away."  अब इस बार मुझे यकीन हो गया था कि मैं परदेस में भिखारी घोषित हो चुका हूँ ।


अब तक मेरे पास 1 डॉलर 70 सेंट्स हो चुके थे । टिकट 4 डॉलर 50 सेंट्स की थी, इसलिए मुझे और पैसे चाहिए थे । आगे बढ़ा तो एक लांड्री में खूबसूरत गोरी लड़की दिखी। वो कपड़े धो रही थी । दूध का जला छाछ भी फूँक-फूंककर पीता है और किसी ख़ूबसूरत लड़की के सामने बेईज्ज़ती हो, ये किसे मंज़ूर होगा । इसलिए मैंने उससे मदद मांगने से पहले, मेरी जेब के सारे पैसे निकाले और कहा, "I have $600 and I am not a beggar. I need to get one of these bills changed so that I can buy a return ticket to Perthmint Station worth four dollar fifty cents and the automatic ticket vending machine is not accepting a $50 bill. Would you be able to help by changing this bill to smaller ones?"
इतनी धमाकेदार परफॉरमेंस के बावजूद उस लड़की ने चेंज नहीं दिया, पर मुझे एक डॉलर दे दिया । मेरे मना करने पर उसने कहा कि वो मेरी मदद कर रही है और बाकी की रकम मैं किसी और से मांग लूं ।
अब मेरे पास दो डॉलर सत्तर सेंट्स थे, टिकट खरीदने के लिए अब भी मेरे पास पूरे पैसे नहीं थे । मैं पूरी तरह से परेशान था और थक भी चुका था । आगे बढ़ा तो देखा अब वो सड़क खत्म हो चुकी थी और वो मार्केट भी । वहाँ से एक रेजिडेंशियल कॉलोनी  शुरू हो रही थी । थोड़ी दूर अंदर जाने पर एक छोटी दुकान दिखी, जिसमें soft drinks, cookies और biscuits जैसे आइटम बिक रहे थे । मैं खुश हो गया कि अब कुछ खरीदकर अपने पचास डॉलर के खुल्ले करा लूँगा । जब वी मेट की गीत की तरह मैं मन ही मन हाथ जोड़कर कहने लगा - प्लीज़ ! बाबाजी अब इस रात में और excitement मत देना। लेकिन कहानी अभी बाकी थी ।


दुकानदार फ्रेंच फ्राइज तल रहा था ।
"Hi, I'd like to have a coke." मेरे ऐसा कहने पर दुकानदार ने कहा, "Anything else, sir?"
मैंने आनन-फानन में एक स्मॉल फ्रेंच फ्राइज आर्डर कर दिया, क्यूंकि अब तक मुझे बहुत जोर की भूख लग चुकी थी । चार डॉलर के सामान के लिए दुकानदार ने मेरे पचास डॉलर के खुल्ले दे दिए। खुल्ले पैसे देखकर मुझे लग रहा था, मैंने कितनी बड़ी जंग जीत ली है ।
दुकान से निकलते वक़्त जब मेरी नज़र फ्रेंच फ्राइज के डब्बे पर पड़ी तो बड़ी हैरानी हुई । क्यूंकि वो इंडिया के मैकडी के फ्रेंच फ्राइज से दस गुने से भी ज़्यादा बड़ा था । ख़ैर, था तो यह मेरी मेहनत का ही फल । खाते हुए मैं स्टेशन पहुंचा और ATVM से वापसी की टिकट खरीद कर ट्रेन में चढ़ गया । इस बीच स्टेशन पर मौजूद उस पुलिसवाले ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, "Man! Finally you got it." ट्रेन का दरवाज़ा बंद हो चुका था और मुझे ऐसा लगा जैसे भगवान उस पुलिसवाले के माध्यम से मुझे बहुत सारी बातें बताना चाह रहे हो ।
मैं इस घटना से काफ़ी कुछ सीख चुका था । अव्वल तो ये कि हमारे देश में ऐसी मदद देने वाले लोग कम मिलते हैं । और उस परदेस में मुझे भिखारी समझ कर या ना समझकर हर किसी ने बेहिचक मदद की । । यह संभव था कि टिकट के पूरे पैसे मांगकर जुटाये जा सकते थे । पर खुद ही आगे आकर मदद करने वाले लोगों का मैं शुक्रगुज़ार रहूँगा ।



ख़ैर, फ्रेंच फ्राइज खाते-खाते मैंने ट्रेन का सफ़र भी पूरा कर लिया.. होटल तक पहुँच गया.. कमरे तक पहुँच गया.. तब जाकर फ्रेंच फ्राइज ख़तम हुई । उस रात खाना भी नहीं खाया । कैसे खा सकता है कोई! इतने फ्रेंच फ्राइज और उसके ऊपर से इतनी चटपटे अनुभव के बाद ।

 

वाशिंग मशीन

वाशिंग मशीन,
क्यूँ कर दी जाती है
बेदखल इस तरह
क्यूँ रख दी जाती है
बालकनी के एक कोने में

घर के बाकी इलेक्ट्रॉनिक
सामानों से अलग
चुपचाप एक कोने में बैठी
वाशिंग मशीन कह रही है
मुझसे ये सौतेला व्यवहार क्यूँ

हम भी तो इसे
पराये की तरह
इस्तेमाल करते हैं
सारे कपड़े इसमें डालकर
घर के अन्दर चले जाते है
मशीन बेचारी खुद ही
कपड़े साफ़ करती है
फिर कपड़े ले जाने को
सायरन बजाती है

हम भी अपना काम बनाकर
मशीन को कवर चढ़ा आते हैं
फिर कुछ घंटों-दिन के लिए
रहती है अकेली
हम कब वाशिंग मशीन का
हाल पूछ कर आते हैं ?


Wednesday, June 18, 2014

मेनोपॉज

आजकल बहुत थकावट रहती है
बेचैनी भी होती है
मनोदशा में बदलाव होता है
शरीर में शिथिलता है
ये मेनोपॉज का दौर है
जिससे मैं गुज़र रही हूँ

एक स्त्री का शरीर
अपनी तमाम संभावनाओं
को समाप्त कर रहा है
जैविक बुढ़ापा कहते है जिसे
उस पीड़ा को
सहन कर रहा है
शरीर बूढ़ा नहीं हुआ
पर शारीरिक मजबूती
हर दिन हार रही है
मुझे इस वक़्त
तुम्हारे साथ की
बहुत ज़रुरत है
मेरी मन:स्थिति को समझो
मुझे हारने मत दो

इस वक़्त मेरा शरीर
तुम्हारी इच्छाओं को
पूरा कर सकने में असमर्थ है
शायद मेनोपॉज के इस दौर
के बाद
मेरी शारीरिक इच्छाओं का भी
अंत हो जाए
उस वक़्त मुझे तुम्हारी
और भी ज़्यादा ज़रुरत होगी
तुम्हारे साथ की चाह होगी
मुझे समझने की कोशिश करना
मुझे हारने मत देना

एक स्त्री को मिले
'रजस्वला' के सबसे
बड़े वरदान का
यह अंत होने का समय है
यह एक स्त्री के जीवन का
परिवर्तनकाल है
यह कुछ सालों का
कष्ट है
जिसे भुगत कर
मैं एक बार फिर
अपने जीवन में
दृढ़ बनकर लौटूंगी
तब तक
मुझे हारने मत देना ।

(स्त्रियों में मासिक धर्म के स्थायी रूप से बंद होने को Menopause या रजोनिवृत्ति कहते है । जो कि ४०-५० की उम्र के आसपास होता है । अलग-अलग स्त्रियों के शारीरिक बनावट के हिसाब से यह होता है। कई बार इस परिवर्तन के समय कुछ स्त्रियों को बहुत कष्ट होता है ।जिसमें एक दो वर्ष तक लग जाते हैं ।)

Tuesday, June 17, 2014

युवती

लेबर रूम के बाहर खड़ा राजेश हाथों को मलते हुए इधर से उधर टहल रहा था । अरुणिमा अन्दर थी.. संसार के सबसे सुखद दर्द का अनुभव करते हुए । छह साल बाद ये दूसरी बार था जब वो ये सब अनुभव कर रही थी । छह साल पहले उत्कर्ष उसका नया जीवन बनकर इस दुनिया में आया था । डॉक्टर ने बाहर आकर खुशख़बरी दी, लड़की का जन्म हुआ है (आजकल उसे बेबी गर्ल कहा जाने लगा है) । राजेश ने डॉक्टर को हल्की स्माइल देकर थैंक यू कहा.. पर ख़ुशी से उछला नहीं । हॉस्पिटल में घर के बाकी लोग थे, तो राजेश ने अपनी भाभी को कहा, "ऑफिस से होकर आता हूँ.. तीन-चार घंटे में आ जाऊँगा" ।

इधर अरुणिमा को मैटरनिटी  वार्ड में शिफ्ट करा दिया गया था । पास में उसकी सम्पूर्णता का प्रतीक..उसकी नन्हीं कली, मुट्ठियाँ बंद किये आराम से सो रही थी । वो उसे देख कर मुस्कुराने लगी.. दिल से आने वाली मुस्कराहट की कोई परिभाषा नहीं होती.. बस ये कि अरुणिमा उस वक़्त इस संसार में ख़ुद को सबसे ज़्यादा ख़ुश महसूस कर रही थी । वो अभी अभी दुनिया में आयी अपनी बेटी को ध्यान से देखने लगी । फिर उसने राजेश को ढूँढा..वो चाहती थी कि इस वक़्त वो सबसे पहले अपने पति से मिले..लेकिन अरुणिमा ने भी काम ज़रूरी समझते हुए इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा।


इस बीच कमरे में घर के लोग आते-जाते रहे.. बीच-बीच में जब वो अकेली होती बस एकटक बच्ची को देखती रहती... कुछ याद करती रहती । देखते-देखते वो उसके होंठों के नीचे वाले हिस्से पर अपनी तर्जनी से गुदगुदी लगाती और खुद ही खिलखिलाकर हँसने लगती.. उसकी भींची मुट्ठियों के बीच अपनी ऊँगली के लिए जगह बनाती और उसकी मुट्ठी में अपनी ऊँगली पकड़ा देती ।
कितने दिनों से तो वो इंतज़ार कर रही थी इस पल का.. एक बेटी को जन्म देने का । दूसरे बच्चे के लिए राजेश तो राज़ी ही नहीं था, पर अरुणिमा की बस एक यही ख़्वाहिश अधूरी थी कि वो एक बेटी की माँ बने । समझाते-समझाते अपनी बात मनवाने में अरुणिमा को कुछ साल ज़रूर लगे, पर इस बीच उसने अपनी बेटी के लिए बहुत कुछ सोच लिया था..जो अभी तक इस दुनिया में आई भी नहीं थी । मन्नतों का सिलसिला भी जारी रहा.. जो प्रेगनेंसी के दौरान तक चला । अभी जब अरुणिमा ने अपनी ऊँगली अपनी बेटी की मुट्ठी में फंसाई हुई है, तो उसे लग रहा है उसने अपनी बेटी को नहीं, बेटी ने उसे जन्म दिया है । जन्म ही तो दिया है.. एक माँ को.. एक बेटी की माँ को

मुस्कुराते हुए अरुणिमा अपने प्रेगनेंसी के दिन याद करने लगी.. क्या-क्या तैयारियां कर ली थी उसने । उसे बेटी की इतनी ख़्वाहिश थी कि उसने नाम तक तय कर लिया था । राजेश से इस बारे में कई बार उसने पूछा, पर पति जी इस मसले पर ज्यादा इंटरेस्टेड नहीं थे । कितने सारे नाम सोच रखे थे, घर में किस नाम से पुकारेगी वो उसे - 'गोरैया' या 'चिड़िया', जो इधर से उधर फुदकती रहे या फिर 'अनोखी' । हमारे यहाँ तो बच्चों के दो नामों की परंपरा हैं ना, इसलिए उसने भी अच्छे वाले नाम के लिए 'आद्या' भी सोच रखा था.. 'अनन्ता' भी और 'विदिशा' भी । अभी अपनी बेटी को देखते हुए वो समझ ही नहीं पा रही थी कि कौन सा नाम सबसे सुन्दर होगा उसके लिए । उसने सोचा, चलो राजेश आ जाए फिर इस बात पर सोचेंगे । ज़्यादा हुआ तो पर्चियाँ उछाल लेंगे । हमारे देश की ये सबसे अच्छी बात है, हम किसी भी समस्या का समाधान पर्चियाँ उछाल कर आराम से कर लेते है ।



इस बीच कमरे में उसका बेटा उत्कर्ष दाखिल हुआ.. पिछले कुछ महीने में उसने अरुणिमा से न जाने कौन-कौन से सवाल कर लिए थे । अरुणिमा ने भी उसे बड़ी ही सहजता से बता दिया था कि इस फूले हुए पेट के अन्दर उसकी छोटी बहन है । वो पूछता, "शोटी बेबी पेट के अन्दर खाना त्या खाती है ?" अरुणिमा हर सवाल का जवाब देती.. उसके हिसाब से हर कुछ समझाती.. ये भी कि वो अब बड़ा भाई बनने वाला है इसलिए उसे अपनी शैतानियाँ कम करनी चाहिए । अब जब वो अस्पताल के बिस्तर पर अपनी माँ और नयी बहन के साथ था तब भी उसके सवाल वैसे ही जारी रहे । पर थोड़ी समझदारी भी दिख रही थी.. वो सीधा बैठा था, और हलके से शोटी बेबी को सहला रहा था । अरुणिमा की आँखें एक बार फिर राजेश को ढूँढने लगी । बाहर पूछवाया तो पता चला कि बस आ ही रहे हैं। अब वो थोड़ा असहज होने लगी थी.. थोड़ा अजीब लगने लगा था उसे । उत्कर्ष के जन्म के समय तो वो मेरे साथ खड़े थे, इस बार क्यूँ नहीं ! वो इस सच से वाकिफ़ थी कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा बेटी के जन्म पर अब भी खुश नहीं होता । बड़े परिवार शायद ये ख़ुशी ऊपरी दिखावे की तरह दिखाते हों.. पर फ़र्क तो किया जाता है । लेकिन राजेश ? उसने फिर सोचा.. नहीं नहीं, राजेश ऐसे नहीं है । हाँ, हर बार मेरी बेटी की मांग वाली बात वो आराम से सुनते.. मुस्कुराते भी ... पर अपना पक्ष कभी साफ़ नहीं रखा । उसने फिर खुद को टोका कि नहीं वो गलत सोच रही है.. ऐसा नहीं हो सकता । राजेश भी बहुत खुश होंगे और मुझे खुश देखकर तो और भी ज़्यादा ।


वो अब फिर अपनी बेटी को निहारने लगी.. शांत, सारी उलझनों से दूर । अरुणिमा ने अपने जीवन के संघर्षों के बारे में सोचते हुए उसके माथे पर अपना हाथ फेरा और कहा कि मैं तुम्हें सारी उलझनों से दूर रखूंगी, मेरी बेटी ।
एक बेटी को जन्म देने का ख़्वाब उसने उस वक़्त से देख रहा था जब वो कुँवारी थी.. उस वक़्त अपनी माँ से इस बारे में चर्चा कर वो खूब हंसती । माँ भी खूब समझती थी कि उसकी बेटी शादी के बाद एक बेटी को क्यूँ जन्म देना चाहती है । माँ कहती, "मुझे पता है, तुम्हारी जो ख़्वाहिशें अधूरी रह गयी हैं..तुम उन सबको अपनी बेटी के मार्फ़त पूरा करना चाहती हो"। अरुणिमा भी मुस्कुराते हुए कहती, "हाँ, माँ । एक लड़की होकर बचपन से लेकर आजतक जिन भी चीज़ों के लिए तरसी हूँ.. मैं अपनी बेटी को वो सबकुछ देना चाहती हूँ.. ख़ासतौर पर... नए-सुन्दर कपड़े"। अरुणिमा ये सब याद करते हुए अब मुस्कुरा रही थी.. पर आँखों में समंदर भर आया था और गले में एक बड़ा पत्थर महसूस हो रहा था । उसने एक बार फिर अपनी ऊँगली बेटी की मुट्ठी में फंसाई, मानो सारी खुशियों की चाभी इन्हीं हाथों में हो ।


थोड़ी ही देर में राजेश कमरे के अन्दर आया । अरुणिमा ने जैसा सोचा था उस तरह से नहीं, बल्कि बिल्कुल सामान्य भाव से । राजेश पास आकर बैठा.. अरुणिमा से उसकी तबियत पूछी । बेटी की ओर देखा.. हलके से मुस्कुराया.. अरुणिमा अबतक शांत ही थी। अब राजेश ने अपना हाथ बेटी के सिर पर फेरा.. तो मानो अरुणिमा की जान में जान आ गयी हो । अब वो थोड़ा मुस्कुराई, पर फिर भी राजेश का ये सामान्य व्यवहार नहीं था, ये औपचारिकता पूरी करने जैसा था । हालांकि उन्हें अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने में थोड़ी दिक्कत होती है.. पर इस वक़्त एक बार अरुणिमा को गले लगाना तो उनका फ़र्ज़ बनता था । अगर वो बेहद ख़ुश होते तो ऐसा ज़रूर करते.. पहले भी किया है.. कोई काम पूरा होने पर.. उत्कर्ष का जन्म होने पर ।


अरुणिमा से रहा नहीं गया, उसने पूछ लिया "तुम ख़ुश नहीं हो?" राजेश ने हाथों से शायद अपनी आँखें छुपाते हुए.. नज़रें नीची करते हुए "हूँ..खुश हूँ.." कहा । अरुणिमा ने एक लम्बी सांस ली, जैसे उसे एक ऊँची चढ़ाई चढ़नी हो..एक संघर्ष और जीना हो..और फिर मुस्कुरायी.. अपनी ऊँगली बेटी की मुट्ठी में फँसायी और एक हल्की नींद के लिए अपनी आंखें बंद की ... जैसे दोनों माँ-बेटी को कुछ प्लानिंग करनी हो ।
.............


(इस पोस्ट का श्रेय मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक और हमेशा ही प्रोत्साहित करने वाले अनुज जी को जाता है, जिन्होंने हमेशा ही मुझे गद्य लिखने को प्रेरित किया । साथ ही, इस टाइटल को भी सुझाया था और एक सीरीज़ लिखने को कही थी ।
तो आप सब के लिए "युवती" का यह पहला भाग प्रस्तुत है। इस सीरीज़ के अंतर्गत स्त्री के जीवन के विभिन्न पड़ावों पर लिखने की कोशिश करुँगी ।)

कुंठित पौरुष

एक स्त्री की देह है ये
और तुम्हारे लिए
बस एक खिलौना भर
अपनी उँगलियों को ऐसे
फिराते हो
जैसे उसकी देह हो
तुम्हारी संपत्ति
पूछा कभी उससे
जब वो बात करती है
तुमसे कुछ कहती है
तब तुम्हारा उसे किसी
भी जगह हाथ लगा जाना
कैसा लगता है
तुम्हारे शब्दों में कहूं तो
तुम स्त्री को किसी स्विच
की तरह दबाकर
"ऑन" करना चाहते हो

होगी तुम्हारे लिए
ये तुम्हारी सख्त़ ज़रुरत
लेकिन एक स्त्री के लिये
ये सम्पूर्णता का विस्तार है
तुमसे जुड़ने का त्यौहार है
पर तुम,
तुम्हें तो स्त्री की क्वालिटी
उसकी 'वर्जिनिटी' में
दिखती है
इस 'वर्जिनिटी' पर वार करके
तुम अपनी पौरुषता का दावा
पेश करते हो
तुम्हारे लिए तुम्हारा ये
स्वघोषित ईनाम
तुम्हें मर्दों की
फूहड़ता वाली श्रेणी
में मिलाता है
'वर्जिनिटी' पाकर
ख़ुद को विजेता समझने वाले
तुम अन्दर से सड़े-गले हो
कितने लाचार हो तुम
तुम्हारा पौरुष भी
एक स्त्री की देह पर निर्भर है
तुम्हारी मर्दानगी भी शेष
नहीं है तुममें
अन्दर से खोखले
बाहर से बीमार नर हो तुम

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Friday, June 13, 2014

दिल्ली का ऑक्सफ़ोर्ड

दिल्ली में इस देश का हर राज्य,हर शहर बसता है । लेकिन मुझे कल ही पता चला कि दिल्ली में अमेरिका भी बसता है । अमेरिकन सेंटर नाम की लाइब्रेरी तो यहाँ है ही । कनॉट प्लेस में टहलते हुए ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर नाम की एक जगह पर नज़र पड़ गयी। ज़ाहिर सी बात है, दिल्ली में ऐसी जगहों को हम ढूंढते रहते है और जब ऐसी अपने हिसाब की जगह दिख जाए तो बिना जाए कोई कैसे रहे.. सो जाना बेहद ज़रूरी हो गया । एंट्री पर ही किताबें सजी हुई थीं । फिर ये कुछ लिखा हुआ भी दिखा..पढ़ने की कोशिश कर सकते हैं ।

अन्दर चारों तरफ़ किताबें, एक सेक्शन में सिर्फ बच्चों की किताबें रखी हुई थी । हैरानी तो तब हुई जब अन्दर की ओर एक सेक्शन में कॉस्मेटिक्स रखे हुए थे । फिर दूसरी ओर देखा तो आम भी रखे हुए थे । मैंने पूछ ही लिया, पता चला सब बिक्री के लिए ही है। मुझे थोड़ी हंसी भी आई कि है तो बुकस्टोर और सामान रंग-बिरंगे बिक रहे हैं । लेकिन अच्छा भी लगा इस तरह का नया प्रयोग देखकर । हालांकि बाहर के देशों में ऐसी जगहें होती है ये तो सुना है । शायद ये कांसेप्ट भी वहीँ से आया हो। तो मैंने भी पूरे खुले दिल से ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर के ओनर को उनकी इस नए प्रयास के लिए nice concept कहते हुए कॉम्पलिमेंट दे दिया ।





उधर दूसरी साइड में हलके परदे के बाद चार-पांच टेबल और कुर्सियां लगी हुई थी  और आर्डर करने के लिए एक छोटा सा किचन । चाय-कॉफ़ी ऑर्डर कीजिये और आराम से आनंद उठाईये ।

मुझे बहुत अच्छी जगह लगी ये । अव्वल तो ये बुकस्टोर आपको दिल्ली में विदेश टाइप फील कराता है  और दूसरा कि चाहे आप किताबी कीड़े हो या ना हो, किताबो के शौक़ीन हो या किताबें सिर्फ पसंद भर हो तो भी आप यहाँ आराम से बैठ सकते हैं। आसपास किताबें हो तो किसे अच्छा नहीं लगता । ज़रूरी नहीं कि किताबें पढ़ी ही जाएँ ।किताबों के बीच रहकर भी अच्छा ही लगता है । फील गुड ।